प्रश्न :
गुरुदेव प्रणाम🙏🙏
ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर क्या होता है और आत्मा का इन शरीरों के साथ क्या सम्बंध है?
कृप्या इसकी विस्तृत जानकारी प्रदान करे🙏🙏
उत्तर (ब्रह्म बोधि):
स्थूल शरीर उस शरीर को कहते हैं जिसमें हाथ, पैर, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क आदि स्थूल रूप में विद्यमान होते हैं। साधारण भाषा में इसी को ‘शरीर’ कहा जाता है। इसे देखा और छुआ जा सकता है, और यही शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है।
सूक्ष्म शरीर इसी स्थूल शरीर के भीतर स्थित होता है। स्थूल शरीर की मृत्यु के पश्चात यह कुछ समय तक बिना किसी स्थूल शरीर के रहता है। इस सूक्ष्म शरीर की सामान्य अर्थों में ‘मृत्यु’ नहीं होती। जब अंततः सूक्ष्म शरीर का भी नाश हो जाता है, तब आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सारी आध्यात्मिक साधना का अंतिम फल सूक्ष्म शरीर का नाश ही है, जिससे आत्मा मोक्ष को प्राप्त कर सके।
वेदांत में इसे सूक्ष्म शरीर कहा गया है, जबकि सांख्य दर्शन इसी को लिंग शरीर कहता है।
कारण शरीर का उल्लेख सांख्य दर्शन में नहीं मिलता, परंतु वेदांत दर्शन में इसका वर्णन है। फिर भी सामान्य मत यह है कि इसे ‘शरीर’ कहना उपयुक्त नहीं। इसे प्रायः अज्ञान या अविद्या कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह वह ‘गोंद’ है, जो आत्मा को सूक्ष्म शरीर से, और उसके माध्यम से स्थूल शरीर से, चिपकाए रखता है। अर्थात संसार से आत्मा को बाँधने वाला कारण यही अज्ञान या अविद्या है।
जिस दिन यह गोंद नष्ट हो जाता है, उसी दिन आत्मा का सूक्ष्म शरीर (और स्थूल शरीर) से संबंध छूट जाता है। तब आत्मा मोक्ष को प्राप्त होकर परम गति को प्राप्त करती है, संसार से सदा के लिए मुक्त हो जाती है, पुनर्जन्म के चक्र से छूट जाती है, और निर्वाण को प्राप्त होती है।
सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर को 17, और कभी-कभी 18 तत्त्वों से निर्मित बताया गया है। इनमें मन, बुद्धि और अहंकार; पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ अपने सूक्ष्म रूप में; तथा पाँच तन्मात्राएँ सम्मिलित हैं।
पाँच तन्मात्राएँ
पाँच तन्मात्राएँ भारतीय दर्शन, विशेषतः सांख्य और योग, में उन सूक्ष्म तत्त्वों को कहा गया है जिनसे आगे चलकर स्थूल भौतिक जगत का निर्माण होता है। संक्षेप में, तन्मात्राएँ इंद्रियों द्वारा अनुभव होने वाले गुणों के सूक्ष्म बीज हैं।
- शब्द तन्मात्रा
– ध्वनि का सूक्ष्म कारण
– श्रवण (कान) से संबंधित
– इससे आकाश तत्त्व की उत्पत्ति होती है - स्पर्श तन्मात्रा
– स्पर्श का सूक्ष्म कारण
– त्वचा से संबंधित
– इससे वायु तत्त्व उत्पन्न होता है - रूप तन्मात्रा
– दृश्य रूप का सूक्ष्म कारण
– नेत्र से संबंधित
– इससे अग्नि (तेज) तत्त्व बनता है - रस तन्मात्रा
– स्वाद का सूक्ष्म कारण
– जिह्वा से संबंधित
– इससे जल तत्त्व उत्पन्न होता है - गंध तन्मात्रा
– गंध का सूक्ष्म कारण
– नासिका से संबंधित
– इससे पृथ्वी तत्त्व बनता है
इस क्रम को इस प्रकार समझा जा सकता है—
प्रकृति → तन्मात्राएँ → पंचमहाभूत → स्थूल जगत
अर्थात जो कुछ हम इंद्रियों से अनुभव करते हैं, उसके मूल में पहले तन्मात्राएँ होती हैं, फिर पंचमहाभूत, और अंततः यह दृश्य संसार।
थोड़ा और विस्तार से देखें तो सूक्ष्म शरीर में पिछले जन्मों के सभी संस्कार, स्मृतियाँ और भाव संग्रहीत रहते हैं। यही सूक्ष्म शरीर हमारी वास्तविक सांसारिक पहचान है। स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद यही सूक्ष्म शरीर नए स्थूल शरीर में प्रवेश करता है और इस प्रकार जन्म-प्रतिजन्म आगे बढ़ता रहता है।
जब तत्त्वज्ञान, आत्मसाक्षात्कार या आत्म-प्राप्ति होती है, तब अविद्या का नाश हो जाता है। वह गोंद नष्ट हो जाता है, जो आत्मा को सूक्ष्म शरीर से चिपकाए हुए था। परिणामस्वरूप आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होती है।
इस प्रकार आत्मा के जिन विभिन्न स्तरों या आवरणों की चर्चा होती है, उनमें स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को तो हमने जाना, किंतु कारण शरीर को ‘शरीर’ न मानकर अज्ञान या अविद्या के रूप में समझा।
किन्तु आगम ग्रंथों में एक अन्य प्रकार के शरीर—भुवनज शरीर—का भी उल्लेख मिलता है। सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर से निकलकर स्वर्ग, नरक, शिवलोक या वैकुंठ लोक आदि में जाता है, तो प्रत्येक भुवन या लोक में उसे एक विशेष भुवनज शरीर प्राप्त होता है।
महोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज—जो आगम साहित्य के महान विद्वान थे—लिखते हैं कि प्रत्येक लोक में प्राप्त भुवनज शरीर उस लोक की प्रकृति के अनुसार भिन्न होता है। इस विषय का विस्तार यहाँ आवश्यक नहीं है। नरक में प्राप्त भुवनज शरीर को यातना शरीर कहा गया है। यह ऐसा शरीर होता है, जिसे बार-बार क्षतिग्रस्त कर पुनः रचित किया जा सकता है, ताकि जीव बार-बार यातनाओं का अनुभव कर सके। उदाहरणतः यदि किसी दंड में शरीर जल जाता है, तो अगली यातना देने के लिए वही शरीर पुनर्निमित किया जाता है। रामचरितमानस में भी इस यातना शरीर का उल्लेख मिलता है।
कुछ शास्त्रों में सूक्ष्म शरीर के आकार का भी वर्णन किया गया है। एक वर्णन के अनुसार यदि बाल की नोक के एक हजार भाग किए जाएँ, और फिर उन में से एक भाग के सौ और भाग कर दिए जाएँ, तो उस सौवें भाग के बराबर सूक्ष्म शरीर का आकार बताया गया है।
गीता में प्रत्यक्ष या निहतार्थ रूप में स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का तथा अज्ञान के कारण उनसे आत्मा का जुड़ाव बने रहने का उल्लेख है तथा अज्ञान के नाश के द्वारा इन दोनों शरीरों से मुक्त हो कर मोक्ष प्राप्त करने के सिद्धांत का समर्थन है।
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