गुरुदेव प्रणाम🙏🙏
एक मन मे आशंका है कि क्या लड्डू गोपाल जी को लहसुन और प्याज वाले साग सब्जियों का भोग लगा सकते है…हमारे क्षेत्र में बिना लहसुन और प्याज के कोई भी सब्जी व दाल नही बनती..
हमारे घर मे भी केवल दशमी, एकादशी व द्वादशी को लहसुन प्याज नही ढलता…
अतः मार्गदर्शन करें🙏🙏
उत्तर (ब्रह्म बोधि)
सबसे पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि ईश्वर-साधना में सबसे अधिक महत्व किस बात का है।
भक्ति-मार्ग में सर्वोच्च स्थान ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति का है—भाव का है। उसके बाद ही किसी अन्य वस्तु या विधि का स्थान आता है।
जब यह प्रेम और भक्ति अपनी चरम अवस्था में पहुँच जाती है, तब ईश्वर और भक्त के बीच कोई औपचारिक मर्यादा शेष नहीं रहती। पर ऐसा प्रेम, और ऐसी कोटि की भक्ति, कितने लोगों में होती है?
तारापीठ के प्रसिद्ध संत वामा खेपा, रामकृष्ण परमहंस के समकालीन थे। वे माँ काली के अनन्य भक्त थे। वे किसी मर्यादा को नहीं जानते थे—गाली-गलौज करते थे, और कभी-कभी माँ काली के मंदिर के भीतर मूत्र भी कर देते थे। यह सब उनके बाल-भाव के कारण था। जैसे कोई बालक माता की गोद में ही पेशाब कर देता है और माता उस पर क्रोधित नहीं होती—वैसा ही उनका संबंध था।
एक बार किसी व्यक्ति ने श्री रामकृष्ण परमहंस के पास जाकर पुत्र की कामना की।
रामकृष्ण परमहंस ने माँ काली से निवेदन किया। माँ ने उत्तर दिया कि उस याचक की नियति में पुत्र नहीं है; इसलिए पुत्र देना संभव नहीं। रामकृष्ण परमहंस ने वही बात याचक को बता दी।
वह व्यक्ति इसके बाद वामा खेपा के पास गया और वही प्रार्थना की। वामा खेपा ने बिना किसी संकोच के उसे पुत्र-प्राप्ति का आशीर्वाद दे दिया—और उसे पुत्र हो भी गया।
कुछ समय बाद वही सज्जन पुनः रामकृष्ण परमहंस के पास आए और बोले—
“आपने तो कहा था कि मेरे भाग्य में पुत्र-योग नहीं है, फिर वामा खेपा ने मुझे पुत्र कैसे दे दिया?”
रामकृष्ण परमहंस पुनः माँ काली के पास गए और पूछा—
“माँ, आपने मुझे ऐसा क्यों कहा कि उसे पुत्र नहीं हो सकता?”
माँ काली ने उत्तर दिया—
“देखो, तुम मेरे समझदार पुत्र और भक्त हो, और वामा खेपा मेरा एक नासमझ भक्त है। उसने बिना मुझसे पूछे पुत्र-प्राप्ति का आशीर्वाद दे दिया। अब उसकी मर्यादा बनाए रखना मेरा दायित्व था।”
इससे स्पष्ट होता है कि जो परम सिद्ध भक्त होते हैं, उनके लिए मर्यादाएँ नहीं रहतीं। वे ईश्वर से कुछ भी दे सकते हैं, कुछ भी ले सकते हैं। यद्यपि वे स्वेच्छा से ऐसा करते नहीं, पर उनके लिए निषेध नहीं होता।
अब भगवद्गीता के तीसरे अध्याय को स्मरण कीजिए। वहाँ प्रजापति ब्रह्मा बताते हैं कि सृष्टि-चक्र को चलाने के लिए देवताओं और मनुष्यों के बीच यज्ञ के माध्यम से परस्पर लेन-देन होना चाहिए। परंतु भगवान श्रीकृष्ण इस कथन को अत्यंत सूक्ष्मता और सौम्यता से सीमित करते हैं।
वे कहते हैं कि जो आप्त-काम, आत्म-तुष्ट और सिद्ध योगी है, उसके लिए कोई कर्म न तो बाध्यकारी होता है, न ही स्वैच्छिक। यज्ञ आदि कर्म सामान्य लोगों के लिए हैं—उनके लिए, जो अभी सिद्ध अवस्था तक नहीं पहुँचे हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के वचन हैं—
यः तु आत्म-रतिः एव स्यात् आत्म-तृप्तः च मानवः,
आत्मनि एव च सन्तुष्टः तस्य कार्यं न विद्यते ॥ (3:18)
अर्थात—
जो मनुष्य आत्म-स्वरूप में ही रमण करने वाला, अपने-आप में तृप्त और संतुष्ट है, उसके लिए कोई करणीय कर्म नहीं रहता—यहाँ तक कि ब्रह्मा द्वारा बताए गए यज्ञादि कर्म भी नहीं।
आगे भगवान कहते हैं—
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ (3:18)
अर्थात—
कर्मयोग से सिद्ध हुए व्यक्ति के लिए न कर्म करने की आवश्यकता रह जाती है, न न करने का कोई कारण। उसे किसी अन्य प्राणी पर निर्भर रहने की भी आवश्यकता नहीं रहती।
इसलिए सिद्धावस्था में पहुँचने पर ऐसे प्रश्न उठते ही नहीं।
पर प्रारंभिक अवस्था में विधि-विधानों का पालन उचित और आवश्यक है।
इसी संदर्भ में—भगवान विष्णु और उनके अवतारों को पूर्ण सात्त्विक भोजन अर्पित करना ही उचित है।
धीरे-धीरे वही सात्त्विक भोजन घर में भी पकना चाहिए। लहसुन-प्याज के बिना भोजन बनाना चाहिए।
यदि प्याज का प्रयोग नहीं किया जाए तो आयु बढ़ने की संभावना रहती है। प्याज को भूनने में अधिक तेल लगता है, जिससे हृदय-रोग की आशंका बढ़ती है और आयु क्षीण होती है।
यदि कोई क्रमशः आगे बढ़ना चाहता है, तो—
पहला चरण: बाल-गोपाल को पूर्ण सात्त्विक भोजन अर्पित करें, भले ही स्वयं लहसुन-प्याज का सेवन करें।
दूसरा चरण: स्वयं भी लहसुन-प्याज का प्रयोग छोड़ दें। भोजन भगवान के लिए ही पकाएँ, क्योंकि जो केवल अपने लिए पकाता है, वह ‘पाप ही खाता है’।
इस चरण में यदि कभी किसी ऐसी वस्तु की इच्छा हो जो बिना लहसुन-प्याज के नि बन सके, तो बाहर या किसी और के यहाँ खा सकते हैं।
तीसरा चरण: लहसुन-प्याज का स्वाद ही नहीं, उसकी गंध भी अप्रिय लगने लगती है। बाहर का भोजन भी छूट जाता है।
चौथा चरण: जब यात्राएँ अधिक हों और दूसरों को असुविधा न देना चाहें, तब मांस-मछली त्यागकर जो संभव हो वही ग्रहण करें। यथासंभव दूध-रोटी, दही-भात, चावल-दाल जैसे सरल भोजन माँगें।
यह प्रश्न भी उठता है कि लहसुन-प्याज सात्त्विक क्यों नहीं माने गए। इसके पीछे तार्किक और वैज्ञानिक कारण क्या हैं?
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ (17:10)
अर्थात—
जो भोजन पहले से पकाया हुआ, रस-रहित, दुर्गंध-युक्त, बासी, बिगड़ा हुआ, जूठा या अपवित्र हो—वह तामस प्रवृत्ति के लोगों को प्रिय होता है।
ध्यान दें—लहसुन और प्याज दोनों दुर्गंध देते हैं।
इसके आगे जिज्ञासु यह भी पूछ सकते हैं कि विज्ञान इस विषय में क्या कहता है।
विज्ञान निरंतर शोध की प्रक्रिया में है। उसे सब कुछ ज्ञात हो—यह आवश्यक नहीं। भोजन की सात्त्विकता और तामसिकता पर हो रहे शोधों की विस्तृत चर्चा आगे की जा सकती है।


