यात्रा-वृत्तांत – ३
27 अक्टूबर, 2025
लंदन में पहला दिन
लंदन की यह मेरी प्रथम संध्या थी।
अक्टूबर के अंतिम दिनों में यहाँ का मौसम “Autumn” का होता है— हवा में हल्की नमी, वृक्षों से झरते सुनहरे पत्ते, और सूर्य की किरणों में एक मद्धिम विषाद।
यहाँ पाँच बजे ही अंधकार उतर आता है। अतः जब हम हीथ्रो एयरपोर्ट से ऑरपिंगटन अपने निवास-स्थल पहुँचे, तब तक लंदन केवल टिमटिमाती रोशनियों का नगर था— मानो जुगनुओं की किसी शांत बारात के बीच से गुज़रते हुए हम रात्रि में यात्रा कर रही हो।
वह दिन था २६ अक्टूबर— कल जब में पहुँचा था तो जिस घर में पहुँचा उस घर में छठ पर्व की तैयारियाँ आरंभ हो चुकी थीं। घर में श्रद्धालु अतिथियों का आगमन, प्रसाद की सुगंध, और स्त्रियों के मंगल गीतों की झंकार — यह सब परदेश में भारतीयता की पुनर्स्मृति जगा रहे थे।
हमारा निवास तीन मंज़िला सुंदर भवन था — लगभग ९० वर्ष पुराना, किंतु नवीन सौंदर्य में पूर्ण। नीचे का तल विस्तृत लिविंग रूम, रसोई और एक छोटा-सा ऑफिस।
पहली मंज़िल पर मेरे भांजे “सिड” और भांजी अनु का, तथा अतिथियों के लिए मेरा कक्ष।
दूसरी मंज़िल पर बहन और बहनोई वसुधा और रजत का निवास।
पीछे एक हरित आँगन (backyard), और सामने फूलों से सुसज्जित गार्डन, इंग्लैंड के उपनगरीय जीवन की शांति का मूर्त रूप।
कल शाम की धुंध में लंदन का सौंदर्य छिपा था, पर आज प्रातः जब मैं बाहर निकला, तब प्रकृति मानो किसी कलाकार के कैनवास पर रंग बिखेर रही थी —
मृदुल धूप, हल्की ठंडक, और वृक्षों पर सुनहरे-लाल पत्तों की झिलमिलाहट।
लंदन और उसकी लय
इंग्लैंड का ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्र अपनी सादगी में ही भव्य है।
यद्यपि ऑरपिंगटन प्रशासनिक दृष्टि से लंदन का ही भाग है, किंतु यहाँ का वातावरण सेंट्रल लंदन की चहल-पहल से भिन्न है — यहाँ प्रगाढ़ शांति है, सुसंस्कृत स्थापत्य, और वृक्षों से आच्छादित सड़कों की कोमल लय।
पतझड़ के मौसम में यहाँ का हर वृक्ष रंगों का रसायन बन जाता है — कहीं अंबर, कहीं सुनहला, कहीं रक्तिम।
आकाश में सदा श्वेत और श्याम मेघों का खेल चलता रहता है —
कभी सूर्य झाँक कर मुस्करा देता है, तो कभी बादलों की गोद में छिप जाता है।
बीच-बीच में हल्की फुहारें इस दृश्य को और आकर्षक बना देती हैं।
हवा में एक “चिल” है जिसमें ठंडक भी है और ताजगी भी।
छठ पर्व की गूंज लंदन में
लंदन में सेटल्ड और ब्रिटिश नागरिकता प्राप्त मेरी बहन का परिवार वर्षों से छठ पर्व मनाता आया है।
यहाँ लंदन में भी इतने उत्तर भारतीय परिवार हैं कि बस व्हाट्सएप पर संदेश दे दीजिए—
“हम छठ कर रहे हैं”— तो दूर-दूर से श्रद्धालु एकत्र हो जाते हैं।
लगभग ३५ परिवार इस बार के पर्व में सम्मिलित हुए हैं।
उपहारस्वरूप ठेकुआ, सिंदूर की डिबिया और अन्य पारंपरिक वस्तुएँ दी जाती हैं।
मैंने वृंदावन से विशेष रूप से सिंदूर की डिबियाँ लाईं, क्योंकि यहाँ ऐसी पारंपरिक वस्तुएँ सहज उपलब्ध नहीं होतीं।
लंदन में सेटल्ड भारतीय महिलाएँ, जो परिष्कृत अंग्रेज़ी में वार्तालाप करती हैं, इस दिन पारंपरिक वेशभूषा में, नाक के नीचे से लेकर माँग तक सिंदूर भर लेती हैं।
यह दृश्य हृदय को छू जाता है — यह केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की घोषणा है।
घर के बैकयार्ड में ही “घाट” का प्रतीक निर्मित किया गया है।
एक बड़ा प्लास्टिक का जलकुंड, जिसमें जल भरकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाना है
प्रथम दिवस अस्ताचलगामी सूर्य को, और दूसरे दिन उदयमान सूर्य को —
वही सूर्योपासना जो भारत की वैदिक परंपरा की सबसे प्राचीन साधनाओं में से एक है।
ऋग्वेद में सूर्य देव की उपासना का यह मंत्र आता है —
उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् ।
दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥ (०१:०५०:१०)
सूर्य केवल प्रकाश का देवता नहीं, वह जीवन का मूल है, समय का साक्षी है।
छठी मइया — प्रकृति की आराधना
कालांतर में इस वैदिक सूर्य-पूजन से जुड़ गया लोक-विश्वास —
छठी मैया की आराधना।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है —
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।। 14:4
(भगवद्गीता 14.4)
“मैं समस्त प्राणियों का बीज देने वाला पिता हूँ, और प्रकृति उनकी माता है।”
यही प्रकृति माता विविध रूपों में भारतभूमि पर पूजित होती हैं —
कभी दुर्गा बनकर, कभी काली बनकर, कभी लक्ष्मी के रूप में,
और छठ पर्व में — छठी मैया के रूप में।
यह पूजन केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व की प्रार्थना है।
कालचक्र और इंग्लैंड
भारत से लंदन आने पर समय का अंतर लगभग 4 घंटे 30 मिनट का था —
और अक्टूबर के अंतिम रविवार को जब “Daylight Saving Time” समाप्त हुआ, तो यह अंतर 5 घंटे 30 मिनट का हो गया।
पर केवल घड़ियाँ ही नहीं, समय का चक्र भी यहाँ बदल चुका।
एक शताब्दी पूर्व यह भूमि “ग्रेट ब्रिटेन” थी।
वह साम्राज्य जिसके विषय में कहा जाता था, “The sun never sets on the British Empire.”
भारत, मिस्र, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, और असंख्य द्वीप — सब इसके अधीन थे।
आज वह विशाल साम्राज्य इतिहास का प्रसंग बन चुका है;
इंग्लैंड पुनः अपने सीमित भूभाग में लौट आया है।
मनुष्य घड़ियों से समय को बाँध सकता है, पर काल को नहीं।
भगवान ने गीता में अर्जुन से कहा था —
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।”
(भगवद्गीता 11.32)
“मैं काल हूँ — लोकों का संहारक, और समय का प्रवाह मुझमें स्थित है।”
यह वही कालचक्र है जो साम्राज्यों को मिटाता और नई सभ्यताओं को जन्म देता है।
समापन
सूर्योदय के बाद का यह पहला दिन ऑरपिंगटन में बीता — न केवल भौगोलिक दूरी पार करने में, बल्कि समय, संस्कृति, और आत्मीयता के अनेक पुल पार करते हुए।
भारत की परंपरा, इंग्लैंड की धरती, और सूर्य की सार्वभौम किरण,
तीनों ने मिलकर इस यात्रा के प्रथम दिन को एक अध्यात्मिक अनुभव बना दिया।

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